व्यास के बाम तट क्षेत्र में हुए थे कुल्लू के 9 दशहरे- 1660 में ढालपुर में हुआ पहला दशहरा
विश्व विख्यात कूल्लू दशहरे का इतिहास काफी रोचक है । जितनी गहराई में जानने का प्रयास करेंगे उतनी ही जिज्ञासु की रूचि बढ़ जाती है। राजा जगत सिंह के शासनकाल में हुइ घटना ने कुल्लू के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय लिख दिया। व्यास के वाम तट के क्षेत्र में राजा जगत सिंह ने 1637 से लेकर 1662 ई. तक शासन किया। हरिद्वार कहो या आयोध्य से कोसल देश के राजा श्री राम व सीता माता की मूर्तियां कुल्लू लाने पर कुल्लू में दशहरा बनाने की परम्परा शुरू हुई। पहली बार 1651 में मकराहड़ वर्तमान गड़सा घाटी में मूर्ति पहुंचने पर भव्य स्वागत दशहरे के रूप में समोहरा मनाया गया । दश सिर वाला जिससे हरा था वह कुल्लू पहुंच गए हैं। मूर्ति व्यास के वाम तट पर जहां रखी वहां दशहरे मनाए गए इस तरह वायास के वाम तट क्षेत्र में 9 दशहरे मनाए गए। राजधानी नगर में भी दशहरा मनाया गया। सुल्तानपुर जीतने के बाद 1660 में नगर से राजधानी सुल्तानपुर स्थानात्रित की तब से ढालपुर में दशहरा मनाने का श्रीगणेश हुआ। ढालपुर में बार्षिक देवस्वागम हुआ करता था और यह समागम दशहरा के दौरान होना शुरू हुआ। इसी कालखंड से दशहरे में शामिल होने बाले देवीदेवताओं को भूमि के मालिक बनाने भी शुरू हुए थे।आज भी जहां जहा मूर्ति रखी गई वहां दशहरे मनाए जाते हैं। खराहल के ग्राहण में दशहरा सात दशक पूर्व से मनाना बंद हुआ है। हरिपुर, नगर ठावा ,मणिकर्ण, वशिष्ठ में दशहरा मनाया जाता है।










